#मलाई_बरफ...
जेठ की तपती दुपहरी में पो पो की आवाज के साथ गांव में बच्चों को इस बात का आभास हो जाता था कि बीच दुपहरी में मलाई बर्फ वाले की इंट्री हो गई है। 90 के दशक में 10 पैसे 20 पैसे और 25 पैसे में यह मलाई बर्फ मिल जाया करती थी कहने को मलाई बर्फ थी पर बर्फ ही बर्फ थी जिसमें चीनी और रंग का घोल मात्र होता था। उस जमाने में 10 20 और 25 पैसे भी घर से मिलना मुश्किल होता था तब आम गेहूं और मक्के देकर बदले में यह मलाई बर्फ खरीदने का अपना ही आनंद था।। जिनकी जड़े गांव से जुड़ी है जो अपने विरासत को नहीं भूले। जेठ की तपती दोपहरी में मलाई बर्फ का स्वाद जरूर आज भी महसूस होता होगा वक्त और हालात ने लोगों को गांव से दूर शहर में रचने बसने को विवश कर दिया बहुत सारी चीज है जो जेहन से गायब नही होती। जेठ की दुपहरी में तपती गर्मी के बीच मलाई बर्फ वाले को देखकर उन दिनों की यादें आंखों के सामने आ गई। हम और आप उन चीजों को कभी नहीं भूल सकते जो हमारे जेहन में यादों के बनने के साथ प्रारंभ हो गई थी चीजों को देखने के बाद हमें लगा यह हमारे लिए नई नवेली है।सिर्फ पर्व त्योहारों के दिन पुआ पकवान खाने महीनों मेले का इंतजार करने का अपना ही आनंद होता था। तपती दोपहरी में हमारा बचपन वातानुकूलित कमरे में कैद नहीं होता था बल्कि आम के बगीचे में धमाचौकड़ी मचाते रहता था। धूल भरी आंधीया हमें घरों में कैद होने पर विवश नहीं करती थी बल्कि हम अपने बगीचे में आम चूनने में लगे होते थे अपना ही आनंद था सब कुछ तो आंखों के सामने ही है पर हम बदल गए नहीं लौटना चाहते हैं अपनी जड़ों की तरफ अपने गांव की तरफ अपनी यादों की तरफ और उन चीजों की तरफ जहां से हमारा अस्तित्व है। हम आज भी नहीं बदले ना हमारे रिश्ते बदले ना नाते बदले ना आहार बदला ना त्योहार बदला और ना कभी जीवन में कुछ चीजे बदलना चाहते हैं ना अपने लोगों को अपनी यादों को खोना चाहते
