रमज़ान बरकत, रहमत और मगफिरत का महीना
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रमजान का पाक महीना चल रहा है यह महीना इस्लामिक कैलेंडर के हिसाब से नौवा महीना है| यह महीना बहुत ही पाक, बरकत, रहमत और मगफिरत का है | इस महीने में खुदा की बेशुमार रहमत होती है | रमज़ान के पवित्र महीने में रोज़ा रखना हर मोमिन पर फ़र्ज़ (ज़रूरी ) है |
अरबी जुबान में रोज़े का शाब्दिक अर्थ"सौम"
है,जिसका अर्थ होता है "रुक जाना"अर्थात बुरे और गलत कामों से अपने को रोकना |
उर्दू और फ़ारसी भाषा में सौम को "रोज़ा " कहते हैं |
संस्कृत भाषा में इसे उपवास कहते है | रोज़े का वास्तविक मक़सद तकवा, गुनाहो से दूरी,भूख को जानना और खुदा से मांफी मांगना |
रोज़ा रखने से इंसान को भूख प्यास का अनुभव होता है, जिससे वह गरीबों और ज़रूरतमंदो के प्रति सहानभूति महसूस करता है | इस महीने में क़ुरान नाज़िल हुआ |
इस्लाम में पाँच रुकुन (स्तम्भ) हैं :- (1) शहदा (2) नमाज़ (3) ज़कात (4) रोज़ा (5) हज | इन पांच रुकन में से "रोज़े" रमज़ान के महीने में रखे जाते हैं | इस पूरे महीने में तीस रोज़े फ़र्ज़ होते हैं |
रमज़ान के ताल्लुक़ से बेशुमार हदीसे हैं लेकिन सोचने की बात है कि हम इस पर कितना अमल करते हैं | हम गरीब एवं ज़रूरतमंद लोगो की कितनी मदद करते हैं,बस सदके के नाम पर सदक़-ए - फ़ित्र दिया और हमने समझ लिया कि हम अपने फ़र्ज़ से अदा हो गए ऐसा नहीं है,हमें इस महीने में गरीब,ज़रूरतमद और मजबूर लोगों की ज़्यादा से ज़्यादा मदद करनी चाहिए, चाहे वह किसी मज़हब का हो उसकी मदद करने की शिक्षा इस्लाम में दी जाती है
इस्लाम में दूसरों की मदद करना भी एक इबादत समझी जाती है |
रमजान के पाक महीने रोज़े रखने का मतलब यह नहीं है कि हमने सूरज निकलने से पहले खाना (सेहरी) खा लिया और सूरज छिपने के बाद खाना खा लिया पूरे दिन भूख - प्यास में रहने का नाम रोज़ा नहीं है,रोज़े का असल मतलब है जो शख्स रोज़ा रखता है उसके हाथ, पैर, आंख, नाक, कान अर्थात जिस्म के हर आज़े (अंगों) को बुराईयों से दूर करना, रोज़ा रूह (आत्मा) को पाक करने का एक ज़रिया है यह महीना इंसान को अपनी इच्छाओ पर काबू करने की तरबियत देता है और हमारे अंदर परेज़गारी पैदा करता है
इस महीने में रात को एक खास नमाज़ अदा की जाती है जिसमें क़ुरान ए पाक कि तिलावत की जाती है जिसे "तरावी"कहते है |
सूरज निकलने से पहले (फज्र कि अज़ान से पहले ) कुछ खा लेना "सेहरी" और सूरज छिपने के बाद कुछ खाना "इफ्तार" कहलाता है |
रमजान के महीने में एक खास रात होती है जिसे "लैलतुल कद्र" कहते है यह रात आमतौर पर 27 वे रमजान की रात होती है यानी रमजान के आख़िरी दस दिन, इस रात को मुसलमान पूरी रात जागकर खुदा कि इबादत करते है और अपने गुनाहों की माफ़ी मांगते है |
रमजान में गरीब और ज़रूरतमंदों को अपनी आय का (ईद से पहले) एक हिस्सा दान (फितरा -ज़कात) देना ज़रूरी है |
इस तरह इस महीने को नेकियों और इबादतों का महीना कहा जाता है |
लेखक :-
दाऊद अली (प्रिंसिपल )सय्यद ग़ालिब अली तालिब अली मैमो इंटर कॉलेज सैदपुर
