रमजान का दूसरा अशरा समाप्ति की ओर
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रमज़ान के दूसरे अशरे अब दो दिन शेष हैं यह अशरा खुदा से क्षमा मांगने का है,
यह आवश्यक है कि हम अपने हृदय को ईश्वरीय दया की ओर मोड़ें । यह अवधि हमें अपने हृदय को शुद्ध करने, अल्लाह से क्षमा मांगने और दूसरों को क्षमा करने का विशेष अवसर प्रदान करती है।
रोजा इंसान के चरित्र निर्माण में मदद करता है और इसमें धैर्य, अनुशासन, सहनशीलता जैसे गुण विकसित होते हैं। यह महीने में नेक काम करने और आत्मशुद्धि का प्रयास करना आवश्यक है।
पवित्र माह रमजानुल मुबारक का दूसरा अशरा (चरण )इन दिनों चल रहा है। आज (रविवार) को रमजान का 18वां रोजा है । इस्लामिक मान्यता के अनुसार रमजान का दूसरा अशरा मगफिरत यानि माफी का माना जाता है, जिसमें खुदा अपने बंदों के गुनाहों को माफ फरमाता है। दाऊद अली ने रमजान के दूसरे अशरे के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि रोजा अल्लाह की खास इबादत है जिसमें दुनिया और आखिरत दोनों की भलाई छिपी हुई है। उन्होंने कहा कि रोजा इंसान के चरित्र निर्माण के साथ उसके अंदर धैर्य, अनुशासन, सहनशीलता और आत्मसंयम जैसे गुण विकसित करता है।
रोजा इंसान में एकता, समानता और सहयोग की भावना को भी मजबूत करता है तथा लोगों को मिलजुल कर रहने और एक-दूसरे की मदद करने की प्रेरणा देता है। पैगंबर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया है कि ‘रोजा इंसान के लिए ढाल है।’ जिस प्रकार ढाल दुश्मन के वार से बचाती है, उसी प्रकार रोजा इंसान को बुराइयों और परेशानियों से बचाने की ताकत देता है।
11वें रोजे से मगफिरत का दूसरा अशरा शुरू हो जाता है। इस दौरान मुसलमानों को अधिक से अधिक नेक काम करने और अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी मांगने पर जोर दिया जाता है। उन्होंने कहा कि रोजा आत्मशुद्धि का माध्यम है, जो इंसान के भीतर की बुराइयों को दूर कर उसे बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देता है। इसलिए इस मुबारक महीने में सभी लोगों को नेक रास्ते पर चलने और मानवीय मूल्यों को मजबूत करने का प्रयास करना चाहिए।
लेख :-
दाऊद अली ( प्रिंसिपल )
सय्य्द ग़ालिब अली तालिब अली मैमो इंटर कॉलेज सैदपुर
